विविधा


  • आम्र-वल्लरी

    वाटिका में आम्र-तरु फैला विशालसांध्य-घन-सी छाँह और पुलकित बयार ।वृक्ष के नीचे खिली है वल्लरीसूर्य का आतप जलाता बेशुमार । स्नेह का आँचल पसारे पितृ-समआम्र-तरु देता नमी और आर्द्रता ।छत्रछाया में खिली फिर वल्लरीप्राप्त करती प्रेम-रस की स्निग्धता । दिन महीने साल बीते इस तरहदूज के चंदा-सी पुष्पित-पल्लवित ।लहलहाती खिलखिलाती मंद स्मितपा पिता का हाथ…

  • मन को रचना भूल न जाएँ

    रचना की पावन दुनिया मेंमन को रचना भूल न जाएँ ।लालच की बढ़ती आँधी मेंसच पर चलना भूल न जाएँ । सागर की तूफ़ानी लहरेंमचता हाहाकार अपार ।नौका डूबे मँझधारों मेंमानव को यह कब स्वीकार ? जीवन-पथ पर बिखरे काँटेराह खोजना भूल न जाएँ ।रचना की पावन दुनिया मेंमन को रचना भूल न जाएँ ।…

  • पीपल – रस

    बचपन के गाँव में मिट्टी के घर के पासछोटी-सी एक पहाड़ी पूरब की ओर ।उस पर लहराता पीपल एक बुज़ुर्ग-साहज़ारों पक्षी चहकते जागते अति भोर । हरे-भरे तरुवर की शीतल-सघन शाखेंस्वागत में फैलातीं बाँहों को गाँव तक ।आँगन के छोर से छोटी-सी पगडंडीले जाती बच्चों को पीपल की छाँव तक । विशालकाय प्रहरी-सा तना शक्तिशालीद्विशाखा…

  • मेरी दुनियाँ मेरा जहां

    जो सुबह गंगा नहाने को जातीमंदिरों में जो पाती चढ़ातीफूल-चंदन की थाली सजातीजो पास आती मुझे ना जगाती जो माथे को चूम चंदन लगातीगाल पर बिखरे बाल वो सजातीधीरे-से फूल-पाती चढ़ातीजो थपकियाँ देती, मुझको सुलाती वो मेरी दुनियाँ थी , मेरा जहां थी।वो कोई और नहीं , वो मेरी माँ थी।। जो रात-दिन काम कर…

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