
बरसों से सुबह-सुबह हर रोज़ वहाँ जाती थी , फिर रजिस्टर खोल अपने दस्तख़त करती थी I न जाने कैसा वह दिन आया किसी ने मीठी आवाज़ में गुनगुनाया – आज अंतिम बार दस्तख़त कर लो यादगार के लिए फोटो भी खींच लो I मन सिसक – सिसक रहा होंठ मुसकुरा रहे कँपकँपाती कलम से …
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