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[12:40 pm, 28/1/2026] Pushpa Manral: “विनय ! मैं तुमसे कितनी बार कह चुका हूँ कि हमारा स्कूल गाँव से बहुत दूर है ।अकेले आना – जाना ठीक नहीं । इसलिए स्कूल जाते समय हम दोनों हर रोज़ चौराहे पर मिलेंगे । वहाँ से एक साथ स्कूल जाएँगे और छुट्टी होने पर एक साथ घर आएँगे लेकिन तुम हो कि मानते ही नहीं । आख़िर ऐसी क्या मुसीबत है जो तुम सब बच्चों से एक घंटा पहले घर से निकल पड़ते हो और शाम को सूरज ढलने के बाद ही घर पहुँचते हो ?“ सौरभ ने झुँझलाकर कहा ।
विनय सुबह बहुत जल्दी उठता और अपना बस्ता चटपट तैयार कर बाहर वाले कमरे में रख देता । उसे हमेशा ही स्कूल जाने की जल्दी पड़ी रहती । सब बच्चे भरपेट खाना खाकर स्कूल जाते पर विनय को इतना सब्र कहाँ कि वह माँ के खाना बनाने का इंतज़ार करे । रसोई में जो भी मिल जाए , जितना भी मिल जाए , वह हड़बड़ी में खाकर स्कूल को चल देता । रास्ते भर वह कभी तेज़ चलता कभी दौड़ लगाता । हमेशा एक ही छटपटाहट एक ही बेचैनी उसके दिलोदिमाग़ को घेरे रखती कि कहीं दुकान पर पहुँचने में देर न हो जाए । एक अद्भुत शक्ति थी जो विनय को वक़्त से पहले घर से निकलने को मजबूर करती थी । वह ऊँचे – नीचे पहाड़ी रास्तों में धुँआधार दौड़ लगाता । उसकी साँसें धौंकनी की तरह फूलने लगतीं मगर वह अब्दुल चाचा की दुकान पर पहुँचकर ही दम लेता ।
अब्दुल की दुकान के बाहर पुरानी मिक्सी , हीटर, बिजली की प्रेस , टूटे तार ,पंखे आदि पड़े रहते थे । वह बिजली का सामान सुधारने का काम करता था । उसकी दुकान से विनय का विद्यालय आधे मील की दूरी पर था । जब तक साढ़े नौ नहीं बज जाते तब तक विनय पूरी तन्मयता से अब्दुल चाचा की कारीगरी देखता रहता । अब्दुल अपने काम में लीन रहता । कभी हीटर उठाकर उसे ग़ौर से देखता । उसके लिए नई तार काटता । कभी टूटे पंखे की धूल झाड़ उसका मुआयना करता । वह घंटों दुकान पर बैठ न जाने कितने पंखे – हीटर ठीक करता । विनय को उसकी ये सारी क्रियाएँ बहुत ही दिलचस्प लगतीं ।
छुट्टी के समय विनय अब्दुल की दुकान तक सब बच्चों के साथ होता । दुकान आयी नहीं कि सरक कर अंदर चला जाता ।और फिर वही सिलसिला — घंटों खड़े रहना , एक ही चीज़ को उलटना- पलटना , तारों के जोड़तोड़ को बारीकी से समझना , अब्दुल की छोटी – छोटी क्रियाओं पर नज़र गड़ाए रखना…….।
सौरभ और विनय अच्छे पड़ोसी थे । एक ही विद्यालय में पढ़ते थे । विनय के पिता के चल बसने के बाद माँ हमेशा चिंतित रहती और सौरभ से कहती , ” बेटा ! तुम बड़े हो । विनय अभी छोटा है । उसे अपने साथ ही विद्यालय ले जाना और शाम को साथ ही घर आना । इतना लंबा रास्ता है । मन में हमेशा डर लगा रहता है ।
मगर विनय को तो कोई और ही तृष्णा अपने आकर्षण में बाँधे हुए थी । न खाने – पीने की चिंता न खेल – कूद का समय । पढ़ाई भी उतनी ही कर लेता जिससे कि विद्यालय में डाँट न पड़े । उसमें जितनी भी उमंग थी , जितना भी उत्साह था , सब अब्दुल की दुकान को समर्पित था । वह खुली आँखों से अब्दुल की ठोका – पीटी , ख़ुटखुट – खटखट ,जोड़ – तोड़ , मिलान सब देखता रहता और बंद आँखों से उन्हीं सपनों में खोया रहता I
माँ कहती — “बेटा ! तुम अच्छे बच्चे हो । समझदार हो । फिर कहना क्यों नहीं मानते ? मैं तुम्हारे लिए कितना पसीना बहाती हूँ । सिर्फ़ यही चाहती हूँ कि मन लगाकर पढ़ाई करो । समय की बर्बादी मत करो I विनय आज्ञाकारी बालक की भाँति सिर हिला देता और माँ संतोष कर लेती ।
मगर यह क्या ! विनय तो बिजली के छोटे – छोटे तारों के साथ शायद अपने भविष्य के ताने – बाने बुन रहा था । उसे एक ऐसी पाठशाला की खोज थी जो उसके अंतर्मन की रुचि को आकाश – सा विस्तार दे । उसे पाठ्य – पुस्तकों के जंजाल में न बाँधे । खुले मन से सोचने की ज़मीन दे , खुले मन से उड़ने का आसमान दे । और सच कहो तो इस उड़ान की शुरुआत तो हो ही गयी थी । अब्दुल चाचा की दुकान क्या मिली मानो उड़ान भरने के लिए एक नया पंख मिल गया — पहला पंख । शाम को अब्दुल दुकान के बग़ल में दिन भर का कूड़ा – कबाड़ फेंक देता । विनय हर रोज़ उस ढेर से टूटे – फूटे पंखे ,हीटर , पंखे की भुजा , स्विच , छोटे – बड़े तार , लोहे की पत्ती , पेंच , कील आदि उठा – उठाकर घर ले आता और फिर वहाँ सूझ – बूझ का एक नया विद्यालय खड़ा हो जाता । हर रोज़ एक नया पाठ्यक्रम , एक रोचक प्रसंग । कभी पंखे की रचना समझी जा रही है , कभी हीटर की मशीनरी खोली जा रही है तो कभी बिजली की प्रेस की बनावट का अध्ययन हो रहा है ।
इधर विनय की रोचकता बेहिसाब बढ़ रही है उधर माँ का धैर्य टूट रहा है । टूटे भी क्यों न । लोगों की ज़ुबान लंबी होती जा रही है । कैसे – कैसे ताने मारे जा रहे हैं । कोई कहता , ”एक लड़का है । वह भी नहीं सँभलता ।” कोई कहता , “दुनिया भर का कबाड़ उठा – उठाकर घर ले जाता है । बड़ा होकर न जाने क्या बनेगा ।” अब तो हद ही होने लगी । गाँव के लड़के टूटा – फूटा सामान , लोहा – लक्कड़ , टुकड़े – मुकडे…सब आँगन में छोड़ जाते हैं और कहते हैं विनय के काम आएगा । परसों आशीष की बुआ एक टूटा हुआ माउस छोड़ गई । बोली — “तुम रख लो । घर में बच्चे इधर – उधर पटकते रहते हैं । क्या पता विनय के काम आ जाए ।” ऐसे में माँ पर क्या बीतती होगी I कोई भला क्या जाने ? शिकायत भी करे तो किससे करे ? घर में कबाड़ – खाना देख तिलमिला जाती है । फिर भरभराती आवाज़ में अपने दिल का भार उतारती है — “विनय ! क्या करना चाहते हो तुम ? मैं देख रही हूँ कि तुम तीन दिन से एक पुराने खटारा पंखे के पीछे लगे हो । उसकी तीनों पंखुड़ियाँ भी अलग – अलग पंखे की हैं । न जाने किन घरों से कब आयी हों । तुम्हें इतनी – सी बात समझ में नहीं आती ?” “माँ ! मैं पंखा बना रहा हूँ । कोशिश तो करने दो । मुझे समझने तो दो । अब तो यहाँ के गाँव – कस्बों में भी पंखे चल रहे हैं । कभी तपन , कभी घुटन ,कभी सूखे का प्रकोप । प्रचंड गर्मी से त्वचा तक झुलस जाती है । मौसम की मार से भला कौन बच पाया है ? वो अलग बात है कि हमारे पास पंखा नहीं है । क्यों नहीं है ? माँ ! यह मैं भली भाँति समझता हूँ I बहुत – से लोगों ने अभी तक पंखा नहीं ख़रीदा । हमने भी नहीं ख़रीदा । जब मेरा पंखा बन जाएगा तब तुम भी रात – भर चैन से सोओगी और मैं भी ।” माँ झुँझलाकर बोली , “अच्छा ! अब मुझे सोने दो । अपना ये तामझाम बंद करो । रात बहुत हो चुकी । तुम भी ये पागलपन बंद करो और सो जाओ ।” विनय ने माँ का कहना माना और बिस्तर पर लेट गया । सोने के प्रयास में आँखें बंद कर लीं । बंद आँखों में कुछ – कुछ चमकने लगा । चक्कर काटने लगा । अहा हा…पंखा चल रहा है …ठंडी हवा दे रहा है …। वह उनींदी आँखें खोल मन ही मन बुदबुदाया — खुली आँखों से देख …उठ…जाग… ।
पंखे को अपना वक़्त दे ।
पंखे को अपनी नींद दे ।
बस फिर वह उठ बैठा और तल्लीन हो गया पंखे में । एक – एक पंखुड़ी को हाथ में उठाता । उनका आपस में मिलान बिठाता । कभी तार जोड़ता, स्विच ऑन – ऑफ़ करता । फिर से कुछ नया सोचता । अपनी उँगलियाँ नचाता । फिर एक नयी कोशिश करता । माँ गहरी नींद में सो रही है । विनय की उँगलियाँ एक दूसरी ही दुनिया की रचना में उलझी हुई हैं । वह जल्दी से बटन दबाता है और फिर ख़ुशी से उछल कर चिल्लाता है — “हुर्रे ! माँ ! पंखा चल पड़ा ! देखो देखो पंखा चल पड़ा ।” माँ एकदम से उठकर देखती है — पंखा चल रहा है । ठंडी हवा दे रहा है । बेटे को गले से लगाकर कहती है ,”तभी तो मैं कहती हूँ मेरे बच्चे जैसा गाँव भर में कोई दूसरा बच्चा नहीं । न कोई ऐब न कोई बुराई । भगवान ऐसा होनहार बच्चा सबको दे ।”
अब यहाँ जेठ की भीषण गर्मी में अकसर पंखा चलता है । रात के सन्नाटे में घर्र – घर्र की आवाज़ आती है । जीवन का ताप भी कुछ मायनों में कम हुआ है । बरसों की कठोर साधना के बाद रातों का सुख – चैन प्राप्त हुआ है । माँ ख़ुश है मगर आधी रात के बाद जब बच्चा गहरी नींद सो जाता है तब वह बिजली के बिल की चिंता में पंखा बंद कर देती है । इतना तो तय है कि जीवन में कुछ नयी गति , कुछ नयी रोशनी आ गयी है । अब यहाँ कबाड़ – ख़ाना नहीं बल्कि एक बहुत बड़ी नामी दुकान है जिसमें बहुत सारे हीटर ,प्रेस , मिक्सी , पंखे और न जाने क्या – क्या सामान है।
विनय की दुकान बालकों की नई पीढ़ी के लिए अपने आप में एक संस्था है । यहाँ बहुत से बालक विद्यालय से आते – जाते घंटों खड़े होते हैं । विनय की कारीगरी को समझते हैं । बिजली के यंत्रों को निरखते – परखते हैं । उनकी संरचना का अध्ययन करते हैं । इस खुली पाठशाला में बच्चे हर दिन अपनी चाह का एक नया पाठ पढ़ते हैं और अपने भविष्य की सपनीली उड़ान का मार्ग प्रशस्त करते हैं । यहाँ की आज़ाद हवा में कोई पाबंदी नहीं । न याद करने की न बेवज़ह रटने की । न घंटों किताब खोल कर समझने का नाटक करने की न इम्तिहान पास करने की । बस जो विद्या सीख ली उसे अपने जीवन में उतारो और दूसरों के लिए भी विद्या के द्वार सदा खुले रखो । असल ज्ञान और असल विद्या के मायने भी यही हैं ।


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