सावन -भादो के बादल जी भर के बरस चुके Iक्वार के आते-आते सारे बादल बरस बरस कर रीते हो गए I वर्षा में नहायी प्रकृति खिल उठी Iलता -गुल्मों के वंदनवार विहँसने लगे Iशरद ऋतु के धवल आकाश में रुई के गद्देदार बादल बिछ गए I हवा की सरसराहट में गुलाबी ठंड की ताजगी महकने लगी I गाँव से दूर ऊँची -ऊँची पहाड़ियाँ वन- तरुओं के हरे-भरे मुकुट पहन उन ग्रामीणों का इंतजार करने लगीं जो हर साल इसी मौसम में रामलीला देखने के लिए हँसते -मुसकुराते दौड़े चले आते हैं Iपहाड़ियों की सारी पगडंडियाँ इन दिनों ग्रामीणों की पद-चाप से आबाद हो जाती हैं I
मैं माँ से लालसा भरे स्वर में विनती करने लगती हूँ –“माँ ! मुझे और दीदी को रामलीला देखने भेज दोगी ना ?अब तो हम बड़ी हो गई हैं I’’ “अरे ! अभी तुम कहाँ से बड़ी हो गई ?रात के समय मैं तुम्हें अकेले कैसे भेज सकती हूँ ?’’ मन उदास हो गया Iदीदी ने मनाना शुरू किया – “माँ ! गाँव भर के बड़े बच्चे जा रहे हैं I कमा दी और मोती जा रहे हैं I कृष्णा और विजय भी जा रहे हैं I वे तो समझदार हैं I हम उन्हीं के साथ रहेंगे Iकसम से माँ ! तुम जो कहोगी ,हम वही करेंगे I” “नहीं गौरी ! तुम दोनों अभी बहुत छोटी हो Iअगले साल चली जाना I” इतने में मैं आँगन के आम से सटकर खड़ी हो गई Iतने पर लगे खड़िया के निशान माँ को दिखाती हुई बोली – “देखो माँ ! पिछले साल मैं यहाँ तक आती थी Iअब कितनी बड़ी हो गई और अब दीदी का सिर तो द्विशाखा से भी ऊपर पहुँच जाता है I” “है ना दीदी ?’’ “हाँ’’ Iमाँ ने कुछ नहीं कहा और हमने समझ लिया कि मना करने पर माँ को बुरा लगता इसलिए माँ राज़ी हो गई Iमाँ कितनी अच्छी है ! वह हमारी बहुत चिंता करती है पर फिर भी हमें मना नहीं कर पाई I
हमने सारा दिन अपने आपको दुनिया भर के छोटे -बड़े कामों में व्यस्त रखा Iदीदी ने कमरे साफ किए I मैंने आँगन में झाड़ू लगाया I माँ खाना बनाने लगी तो मैं सामने की क्यारी से धनिया तोड़ लाई Iदीदी ने फटाफट चटनी बना दी Iनमक भी पीस दिया I खाना खाकर माँ लेटी तो हम दोनों ने अपने बस्ते निकाल लिए Iदशहरे की छुट्टियों में मिला काम करने लगे Iमाँ की नींद खुली तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि एक ही दिन में इतना बड़ा परिवर्तन ! आखिर बात क्या है ?
शाम हुई तो कमा दी और मोती ने अपने घर की ढलान से ऊँचे स्वर में आवाज लगाई– “सुनो …..सब लोग सुनो …..Iएक घंटे में रामलीला के लिए निकल पड़ेंगे Iसब लोग हमारे यहाँ आ जाना I” मैंने नया फ्रॉक निकाल कर पहन लिया Iदीदी ने भी नया फ्रॉक निकाल कर पहन लिया I तब माँ ने पूछा , “तुम यह क्या कर रही हो ?नए कपड़े पहन कर कहाँ जा रही हो ?’’ हम दोनों ही सकपका गए Iदीदी ने कहा , “माँ ! तुम ही तो हमें रामलीला देखने के लिए भेज रही हो ना ?सुबह ही तो पूछा था तुमसे I’’ “लेकिन मैंने तो ‘हाँ’ नहीं कहा और तुम्हारे पिताजी शहर में इतनी दूर रहते हैं I पूरे एक दिन का रास्ता है Iमैं तुम्हें अकेले कैसे भेज सकती हूँ ? वापसी में पूरे दो -तीन बज जाते हैं Iरात में सूने रास्ते में तुम यहाँ तक कैसे आओगी ?ना ना Iदाडिम की डुबेरी {अनार के पेड़ों की घाटी }के पास तो तुम्हें दिन में भी डर लगता है I’’ दीदी ने विनती की – “माँ ! हम दोनों कमा दी के यहाँ रहेंगे Iकमा दी और मोती ने हमें अपने यहाँ ठहरने का न्योता दिया है I उन्होंने अपने माता-पिता से भी भली-भाँति पूछ रखा है I” मैंने माँ से लिपटकर कहा , “देखो न माँ ! यह फ्रॉक तुमने हरेले के त्यौहार के लिए सिला था Iसिर्फ उसी दिन पहना Iतब से रामलीला के लिए सँभाल कर रखा है Iएकदम नया है I है ना माँ ?” माँ रुआँसी- सी हो रही थी Iएकदम हँस पड़ी Iदीदी ने पूछा , “अब हम जा रहे हैं ना माँ ?” माँ ने कहा , “ठीक है जाओ I रात में अपनी कमा दी और मोती के यहाँ रहना I”
माँ ने चूल्हा जलाया Iबच्चों को बिना रोटी खिलाए कैसे जाने दे I बरसाती लकड़ियाँ धुआँ धुआँ छोड़ रही थीं I मारे उत्साह के रोटी का इंतज़ार भारी पड़ रहा था Iरामलीला जाने की खुशी में भूख- प्यास सब गायब थी Iएक-एक धुआँ लगी रोटी जल्दी-जल्दी खाई और चल पड़े बच्चों के हुजूम में I
गाँव की पगडंडियों को नापते बच्चे, बूढ़े, जवान चले जा रहे हैं I थोड़ी ही देर में पहाड़ी से उतरती जलधारा की गूँज सुनाई देने लगी Iअब चिंता सताने लगी कि नदी पार कैसे करेंगे Iमोती की समझदारी काम आई Iउसने हम दोनों का हाथ थाम धीमे-धीमे जलधारा पार कराई Iअब हम पहाड़ी की घुमावदार चढ़ाई चढ़ने लगे Iरास्ते में स्रोत का मीठा पानी पीकर थकान मिटाते और आगे की राह पकड़ते Iलो ! अब तो सड़क भी आ गई Iयहाँ से रामलीला का मैदान पास ही है I हारमोनियम की धुन सुनाई देने लगी है Iतबले की थाप हवा में गूँज रही है Iआज तो राम- जन्म है Iपूरी बाल -लीला देखने को मिलेगी I
मोती हमारे लिए अच्छी जगह सुनिश्चित कर अपने दोस्तों के साथ चला गया था Iदो -ढाई घंटे पूरी शिद्दत से रामलीला का आनंद लिया Iमाँ ने दस -दस पैसे दिए थे Iरामलीला के बीच में उठकर सारा कुबेर का धन दोनों ने ही मूंगफली ,चूरन और टॉफी में खर्च कर दिया था Iअब घर वापसी का समय आ गया Iशरद ऋतु केआकाश से चाँदनी बरस रही थी Iचाँद की रोशनी घनी पत्तियों के बीच से छन- छन कर धरती पर पड़ रही थी Iरास्ते दूधिया रोशनी से झिलमिला रहे थे Iइसी के सहारे सब लोग टेढी -मेढ़ी राहों पर चले जा रहे थे I
ढाई बजे के करीब कमा दी के घर पहुँचे Iउनकी माँ ने कमा दी ,दीदी और मुझे एक कमरे में बिछी खाट पर सुला दिया Iमोती दूसरे कमरे में सोने चला गया Iहम तीनों ही देर तक बतियाते रहे Iभूख के मारे बुरा हाल हो रहा था Iहमारी खाट के नीचे और अगल-बगल अमरूद की टोकरियाँ बाजार के लिए बनाकर रखी थीं Iउनके मुँह टाट लगाकर सिले थे Iअमरूदों की खुशबू से मन अधीर हो उठता था Iमैंने कमा दी से पूछ ही लिया, “तुम्हारे आँगन में अमरूद के कितने पेड़ हैं दीदी ?हमारे तो चार हैं I’’ वे समझ गईं I बोलीं, “तुम्हें अमरूद खाना है ? चलो टोकरी से निकाल लो I’’ दीदी ने तुरंत ही हाथ लंबा करके दो -तीन अमरुद निकाल लिए Iदोनों ने ही अमरुद खाए I भूख शांत हुई और फिर कब नींद आई, पता ही नहीं चला I
सुबह की धूप पर्वत-चोटियों से उतरकर गाँव भर में फैल गई थी Iतब कहीं जाकर नींद खुली और हम कमा दी से भीनी -भीनी विदाई लेकर अपने घर को चल दिए Iमोती हमें बड़ी हिफ़ाजत के साथ दाडिम की घाटी के उस पार तक पहुँचा गया था Iफिर वहाँ से अपने घर लौट गया I
तन -मन अलसाए हुए थे Iघर के पास ही केले का बगीचा था Iकदली- दल झूम रहा था Iबरसों पहले वहीं से पानी का एक सोता फूट पड़ा था I बहते पानी से उनींदी आँखों में छपकी मारी और खिले मन से घर पहुँचे I “माँ ! ओ माँ ! हम आ गए I’’ माँ से मिलते ही फिर वही अंत हीन बातें – कभी रामलीला की …..कभी कमा दी की ….और कभी कमा दी के घर बिताई रात की ….. I
मैं अक्सर सोच में पड़ जाती हूँ कि माँ ने हमारी बात कितनी सहजता से मान ली Iरामलीला भी भेज दिया और कमा दी के यहाँ भी ठहरने दिया Iतब जीवन कितना सरल और निष्कपट था Iऔर हाँ ,बच्चों का जीवन उतना ही सुरक्षित भी था Iबच्चे -बच्चियों की सुरक्षा को लेकर माता -पिता के मन में भय नहीं था Iअब वक्त खूंखार हो चला है Iखूनी भेड़िये बेखौफ़ घूम रहे हैं I दरिंदगी के जंगल में कोई भी कहीं भी सुरक्षित नहीं है I
गाँव- शहर में , कस्बों में जानवर ! स्कूल-कॉलेज में ,अस्पतालों में जानवर !
बस-ट्रेन में ,कैब में और ऑफिसों में जानवर !सब तरफ जानवरों का खौफ़ है I
आज तरक्की तो बहुत कर ली ,पर माँ का वह इतमीनान गायब है I भरोसा भी गायब है Iअब माँ बहुत डरती है Iअब न कमा दी और मोती है और न उनका घर और न घरवाले I
“ओ कमा दी ! ओ मोती ! तुम वापस आओ न I
जल्दी वापस आओ न I
दुनिया भर के तमाम बच्चे -बच्चियों को तुम्हारा घर भी चाहिए और घर वाले भी I”
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