नैनीताल के पास ही एक छोटी – सी जगह है रानीबाग। इतनी छोटी कि इसे कस्बा भी नहीं कह सकते। पर इस छोटी – सी जगह के भी कुछ खास मायने हैं। मेरे मन में यह जगह छोटी होकर भी बहुत बड़ी हो गई है । महान होने के लिए आकार में बडा़ होना बिलकुल भी ज़रूरी नहीं और जो ज़रूरी है उसकी यहाँ कमी नहीं । दुनिया के सभी मुल्कों की तरह यहाँ के भी अपने रीति – रिवाज हैं, अपनी मान्यताएँ हैं।
रानीबाग में घने जंगलों के बीच एक पहाड़ी नदी की धारा बहती है जो सदियों से वन-पर्वतों और घाटियों के एकांत को चहल-पहल में बदल देती है। यहाँ इसी धारा के तट पर जिया राणी (पर्वतीय अंचल की एक देवी) का मंदिर है। पर्वतीय अंचलों में यह देवी विशेष रूप से पूज्य है। इसीलिए रानीबाग यहाँ के तीर्थस्थल के रूप में प्रसिद्ध है और इसे चित्रशिला कहा जाता है। हर वर्ष यहाँ मकर संक्राति की पहली रात यानि 13 जनवरी को मेला लगता है। एक अनोखा मेला। पर्वतीय स्थलों के सभी लोग अपनी-अपनी टोलियों में आते हैं। वे अपने साथ अपने-अपने कुल देवी-देवताओं को लाते हैं। कुछ गाड़ियाँ बुक करके आते हैं, कुछ पैदल ही लंबी यात्रा करने के बाद जिया राणी के आँगन तक पहुँचते हैं। देवी-देवताओं के इस मेले में सभी टोलियों के अपने-अपने झंडे होते हैं, ढोल-नगाड़े होते हैं और दूसरे साज-बाज होते हैं। पहाड़ी रास्तों में गाते-बजाते, नाचते, भजन-कीर्तन करते लोग 13 जनवरी की शाम को रानीबाग पहुँचकर अपना डेरा डाल देते हैं। रातभर सभी टोलियाँ ढोल-नगाड़े बजाती हैं, भजन-कीर्तन करती हैं। सुबह होते ही नदी में स्नान करती हैं और अपने साथ लाए हुए सभी देवी-देवताओं को भी चित्रशिला के इस तीर्थ में नहलाकर अपने घर-गाँवों को ले जाती हैं।
पिछले वर्ष मुझे भी कुछ ऐसी प्रेरणा हुई कि मैं भी अपने भतीजे के साथ चित्रशिला को रवाना हो गई। तेरह जनवरी को शाम चार बजे हम दोनों ट्रेन में बैठे और ग्यारह बजे रात को काठगोदाम स्टेशन पर उतर गए। रात के ग्यारह बजे भी स्टेशन पर रिक्शेवालों की भीड़ थी। ठंडी हवा के थपेड़े डंक की तरह लग रहे थे। ऑटो रिक्शा और कार वाले शोर कर रहे थे। सवारियाँ पाने के लिए सभी में जंग छिड़ी थी। तभी ‘‘बाबूजी ! ऑटो ऑटो, ‘दीदी ! ऑटो ऑटो’’ कहता हुआ एक नवजवान हमारे करीब आया। विनती भरे स्वर में बोला -‘‘कहाँ जाओगे ?’’
मैंने उससे कहा -‘‘हमें रानीबाग जाना है’’। उसने एकदम पूछा -‘‘चित्रशिला जाओगे ?’’ मैंने कहा , ‘‘हाँ’’ और हम दोनों ऑटो में बैठ गए । ‘‘पर तुम्हें कैसे पता कि हम वहीं जा रहे हैं ?’’ मैंने पूछा। ‘‘बहन, हमें सब पता है। तीन पीढ़ियों से हम लोग जिया राणी की सेवा कर रहे हैं। बहुत आनंद आता है हमें तो माँ की सेवा में। वहाँ रात भर मेला लगता है। अब्बाजान तो मुइो तब से मेले में ले जाया करते थे जब मैं चार साल का रहा हूँगा।’’ वह लगातार बोलता जा रहा था। मैंने पूछा,‘‘तुम्हारा नाम क्या है भैया ?’’ बोला, ‘‘अकरम।’’ ‘‘अकरम’’ मैंने दोहराया ।‘‘बड़ा अच्छा नाम है। घर में और कौन-कौन हैं ?‘‘ ‘‘अम्मी-अब्बा हैं, हमारी बीबी हैं और दो बच्चे।’’ वह आगे फिर बोला -‘‘सभी यहाँ आए हैं चित्रशिला तीर्थ में। हम तो हर साल आते हैं। मैं शाम को ही चार बजे उन्हें ले आया था। बाद में जगह नहीं मिलती इसलिए वे शाम से ही वहाँ कंबल बिछाकर बैठ जाते हैं। रातभर जागरण करते हैं। सुबह मुँह अँधेरे नदी में नहा कर देवी-देवताओं को स्नान कराते हैं और सुबह खिचड़ी का प्रसाद पाकर घर आ जाते हैं।’’ अकरम सभी बातें बहुत ही तन्मयता से बता रहा था। ऐसा लगता था जैसे उसका और हमारा बहुत पुराना नाता हो।
मुझे उसकी हर बात बहुत दिलचस्प लग रही थी। मैंने पूछा -‘‘ भैया, आप और क्या-क्या करते हैं वहाँ ?’’ वह तो जैसे इंतज़ार कर रहा था मेरे प्रश्न का । तुरंत बोला -‘‘वहाँ देह ठंडी पड़ जाती है कड़ाके की सर्दी में। ठंडी हवाएँ चलती हैं। आग के बगैर जाड़े की रात कटती नहीं दिखती। हम वहाँ जगह-जगह पर आग जलाते हैं। लकड़ी लाते हैं। रात में खिचड़ी बनती है। नदी से पानी भरकर लोगों को देते हैं। ये तो अल्लाह का काम है। अल्लाह के काम में जितनी मदद हो जाए उतना अच्छा। अब्बा कहते हैं कि सबकी मदद करो तो भगवान खुश होता है। मन में अगर कोई भेदभाव पाल लेा तो वह नाराज़ होता है।’’
अकरम न जाने और कितनी ही दिलचस्प बातें करता । मगर चित्रशिला आ गया। उसने ऑटो रोका और बोला -‘‘बहन, ये रहा चित्रशिला। अब आप उतरकर जहाँ कहीं भी थोड़ी-सी जगह मिले, कंबल बिछाकर बैठ जाइए। मैं उधर चलता-फिरता काम करता रहूँगा और आपको भी पूछ लूँगा। जब कभी किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो देता जाऊँगा।’’
सारी घाटी गूँज रही थी। रात के अँधेरे में प्रकाशमान। हजारों दीए जल रहे थे। कहीं मोमबत्तियाँ, कहीं एमरजेंसी लाइट। इसके अलावा बीसियों अलाव जल रहे थे। सैकड़ों दुकानें लगी थीं, ठेले लगे थे। कोई कहता, ‘‘अकरम, लकड़ी और लाओ। आग बुझ रही है।’’ कोई कहता, ‘‘अरे अकरम को बुलाओ। अकरम भाई के साथ ही पूजन-सामग्री की डलिया लेकर आऊँगा।’’ ‘‘अकरम ! झंडा डंडे से निकल गया है, ढोल गरम करना है, पानी खतम हो गया है, पानी लाना है।’’ अकरम मुझे यहाँ-वहाँ भागता-दौड़ता नज़र आ रहा था। वह हर काम संजीदगी से कर रहा था। उसके हर काम में समर्पण का भाव था । निष्ठा और आत्मीयता थी। उसकी हर एक क्रिया से पुलक प्रकट होता था। कितने रूप हो गए थे उसके – लकड़ी लाता अकरम, पूजा की डलिया लाता अकरम, झंडे ठीक करता और ढोल गरम करता अकरम ; पानी के घड़े लाता अकरम।
सभी टोलियों में खिचड़ी पक चुकी थी। हम जैसे बहुत से लोग थे जिनकी कोई टोली नहीं थी। मगर यहाँ कोई तेरा-मेरा भी नहीं था।सब एक रूप थे । कोई भी कहीं भी जा सकता था और कहीं भी खिचड़ी पा सकता था। ये बात यहाँ खूब समझ में आती थी कि हम सब एक हैं और एक ही पिता की संतान हैं।

ब्रह्ममुहूर्त हुआ। नदी की ठंडी धारा में सबने डुबकी लगाई। श्रद्धा और भक्ति का ऐसा अद्भुत संगम और कहाँ हो सकता था ! सभी ग्रामीणों ने अपने साथ लाए देवी-देवताओं को नहलाया और सभी दल नाचते-गाते जिया राणी से विदा लेकर चलने लगे। मेरी आँखें किसी कोे ढूँढ रही थीं जिससे मिले बग़ैर मेरे कदम आगे बढ़ने को राज़ी नहीं होते थे। मैंने अकरम को बहुत ढूँढा। अकरम वहाँ नहीं था। मैं बहुत कुछ पाकर भी खोया-खोया महसूस कर रही थी। सहमे कदमों से हम दोनों ही आगे बढ़े। ऑटो स्टैन्ड पर पहुँचे तो किसी ने मेरे भतीजे के कंधे से बैग खींचा। अकरम हमारा बैग लेकर अपने ऑटो में रखने लगा और मुसकुराते हुए बोला – ‘‘आपको स्टेशन तक छोड़ना था। इसीलिए भागा भागा आया। भक्तों को बस स्टैन्ड तक पहुँचाकर आया। सामान बहुत ज्यादा था इसलिए बसों में चढ़ाकर ही आपके पास वापस आया।’’
अकरम के ऑटो में बैठी-बैठी मैं सोच रही थी – चित्रशिला कितनी पवित्र है! सच्चे अर्थेां में यह इंसानी दुनिया का सच्चा तीर्थ है । ऐसा तीर्थ जहाँ सिर्फ सच्चे तीर्थ यात्री होते हैं: धर्म – जाति और भाषा के बंधन से मुक्त । इसीलिए चित्रशिला सबकी है और अकरम ! सबका अकरम ! कितना नेकदिल है वह ! दुनिया के अनेक मुल्क मेरे विचारों में आ-जा रहे थे और उन मुल्कों के भयंकर चित्र उतर रहे थे – कत्ले-आम, बम-धमाके, गोली-बारूद, हिंसा-आगजनी। मैंने मन ही मन अकरम की नेकदिली को सलाम किया और श्रद्धानत होकर भगवान से विनती की -‘‘काश ! हर मुल्क में चित्रशिला होती ! काश ! हर मुल्क में अकरम होता !’’

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