वह थी सुबह के पूरब की लाली
खिल उठी पत्ती और डाली डाली
एक छोटी-सी रंगीन बगिया
उसमें रहती थी नन्ही- सी चिड़िया
डाली-डाली में खिलती थीं कलियाँ
पास बहती थी मस्ती में नदिया ।
बेलबूटों में झुरमुटों में गीत था
फूल- पाती कली में संगीत था
हर दिशा में सुबह की महक थी
सारे जग में बसी एक चहक थी
वो चिड़िया मस्ती में इठला के गाती
ठंडी नदिया में डुबकी लगाती ।
मौज़-मस्ती भरा उसका सपना
सपना एक दिन बनेगा उसका अपना
वो एक दुनिया रचाने चली थी
एक घरौंदा बसाने चली थी
वो मनचली आदमी से भली थी
डाली में झूल -झूलकर पली थी ।
दूर जाकर थे तिनके बटोरे
रास्तों से थे पत्ते समेटे
चोंच से उसने धागे सहेजे
ऊन के टुकड़े मुख से पिरोए
तिनका -तिनका सजाती चली थी
पत्ता- पत्ता सँवारती चली थी ।
अहा हा ! जाने क्या हो गया था
प्यारा – सा एक सृजन हो गया था
एक नन्हा -सा घर रचा लिया था
घौंसला प्यार का बसा लिया था
वन का जीवन महकने लगा था
नन्हा प्राणी चहकने लगा था ।
गोद में लेकर झूला झुलाती
पंखों की तह में लेकर सुलाती
धान – मक्का के खेतों में जाती
बालियाँ तोड़ मुँह में दबाती
मातृ-रस में सनाकर भिगाती
चोंच से बूँद- बूँद रस पिलाती ।
चिड़िया हमको सिखाने चली थी
उसकी दुनिया इंसां से भली थी
गोली – बारूद बंदूक छोड़ो
बम – धमाकों से मुँह अपना मोड़ो
मन की संकीर्ण दीवार तोडो़
और मुहब्बत की मीनार जोड़ो ।


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